औरंगजेब की मृत्यु
औरंगज़ेब के अन्तिम समय में दक्षिण में मराठों का ज़ोर बहुत बढ़ गया था। उन्हें दबाने में शाही सेना को सफलता नहीं मिल रही थी। इसलिए सन 1683 में औरंगज़ेब स्वयं सेना लेकर दक्षिण गया। वह राजधानी से दूर रहता हुआ, अपने शासन−काल के लगभग अंतिम 25 वर्ष तक उसी अभियान में रहा। 50 वर्ष तक शासन करने के बाद उसकी मृत्यु दक्षिण के अहमदनगर में 3 मार्च सन 1707 ई. में हो गई। दौलताबाद में स्थित फ़कीर बुरुहानुद्दीन की क़ब्र के अहाते में उसे दफना दिया गया। उसकी नीति ने इतने विरोधी पैदा कर दिये, जिस कारण मुग़ल साम्राज्य का अंत ही हो गया।
गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु
7 अक्टूबर 1708 (उम्र 42) नांदेड़, महाराष्ट्र, भारत
गुरु गोबिन्द सिंह ( जन्म: 22 दिसंबर 1666, मृत्यु: 7अक्टूबर 1708) सिखों के दसवें गुरु थे। उनका जन्म बिहार के पटना शहर में हुआ था । उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त 11 नवम्बर सन 1675 को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों ( जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ 14 युद्ध लड़े।
गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। सिखों के दस गुरु हैं ।
नादिरशाह का आक्रमण
नादिरशाह फ़ारस का शासक था। उसे "ईरान का नेपोलियन" कहा जाता है। भारत पर नादिरशाह का आक्रमण 16 फ़रवरी, 1739 को हुआ था। वह बहुत ही महत्वाकांक्षी चरित्र का व्यक्ति था और भारत की अपार धन-सम्पदा के कारण ही इस ओर आकर्षित हुआ। मुग़ल सेना के साथ हुए नादिरशाह के युद्ध को 'करनाल के युद्ध' के नाम से जाना जाता है।
भारत की ओर आकर्षित
नादिरशाह के आक्रमण के समय मुग़ल साम्राज्य के विघटन के साथ-साथ उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा प्रबन्ध भी ढीले हो गए थे। इस दौरान भारत पर पश्चिम से दो विदेशी आक्रमण हुए। पहले का नेतृत्व नादिरशाह ने और दूसरे का नेतृत्व अहमदशाह अब्दाली ने किया। नादिरशाह फ़ारस का शासक था और भारत के अपार धन ने ही उसे आक्रमण करने के लिए आकर्षित किया था। अपनी भाड़े की फ़ौज को बनाए रखने के लिए उसे पैसों की आवश्यकता थी। भारत से लूटा गया धन इस समस्या का हल हो सकता था। साथ ही मुग़ल साम्राज्य की कमज़ोरी ने इस लूट को और भी आसान कर दिया।
आक्रमण
11 जून, 1738 को नादिरशाह ने ग़ज़नी नगर में प्रवेश किया। इसके फलस्वरूप 29 जून, 1738 को उसने काबुल पर अधिकार कर लिया। इसके बाद आगे बढ़ते हुए नादिरशाह ने अटक के स्थान पर सिन्धु नदी को पार कर लाहौर में प्रवेश किया। मुग़ल गर्वनर 'जकारिया ख़ाँ' ने बिना युद्ध किए ही हथियार डाल दिये और 20 लाख रुपये तथा अपने हाथी नज़राने में देकर स्वयं को और लाहौर का और 'नासिर ख़ाँ' को काबुल और पेशावर का गर्वनर नियुक्त किया। 16 फ़रवरी, 1739 को नादिरशाह सरहिन्द पहुँचा। सरहिन्द से अम्बाला, अम्बाला से अजीमाबाद और फिर करनाल की ओर कूच किया, जहाँ उसका मुग़ल सेना के साथ युद्ध हुआ। यह युद्ध 'भारतीय इतिहास' में 'करनाल के युद्ध' के नाम से प्रसिद्ध है।
प्लासी युद्ध
प्लासी का युद्ध 23 जून, 1757 ई. को लड़ा गया था। अंग्रेज़ और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेनायें 23 जून, 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर 'नदिया ज़िले' में भागीरथी नदी के किनारे 'प्लासी' नामक गाँव में आमने-सामने आ गईं। सिराजुद्दौला की सेना में जहाँ एक ओर 'मीरमदान', 'मोहनलाल' जैसे देशभक्त थे, वहीं दूसरी ओर मीरजाफ़र जैसे कुत्सित विचारों वाले धोखेबाज़ भी थे। युद्ध 23 जून को प्रातः 9 बजे प्रारम्भ हुआ। मीरजाफ़र एवं रायदुर्लभ अपनी सेनाओं के साथ निष्क्रिय रहे। इस युद्ध में मीरमदान मारा गया। युद्ध का परिणाम शायद नियति ने पहले से ही तय कर रखा था। रॉबर्ट क्लाइव बिना युद्ध किये ही विजयी रहा। फलस्वरूप मीरजाफ़र को बंगाल का नवाब बनाया गया। के.एम.पणिक्कर के अनुसार, 'यह एक सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी सेठों तथा मीरजाफ़र ने नवाब को अंग्रेज़ों के हाथों बेच डाला'।
बंगाल पर अंग्रेज़ों का अधिकार
यद्यपि प्लासी का युद्ध एक छोटी-सी सैनिक झड़प थी, लेकिन इससे भारतीयों की चारित्रिक दुर्बलता उभरकर सामने आ गई। भारत के इतिहास में इस युद्ध का महत्व इसके पश्चात् होने वाली घटनाओं के कारण है। निःसन्देह भारत में प्लासी के युद्ध के बाद दासता के उस काल की शुरुआत हुई, जिसमें इसका आर्थिक एवं नैतिक शोषण अधिक हुआ। राजनीतिक रूप से भी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति मज़बूत हुई। बंगाल अंग्रेज़ों के अधीन हो गया और फिर कभी स्वतंत्र न हो सका। नया नवाब मीरजाफ़र अपनी रक्षा तथा पद के लिए अंग्रेज़ों पर निर्भर था। उसकी असमर्थता यहाँ तक थी, कि उसे दीवान रायदुर्लभ तथा राम नारायण को उनके विश्वासघात के लिए दण्ड देने से भी अंग्रेज़ों ने मना कर दिया। प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल में 'ल्यूक स्क्राफ़्ट्रन' को नवाब के दरबार में अंग्रेज़ रेजिडेंट नियुक्त किया गया।
बक्सर की लड़ाई
मीर कासिम ने देखा कि अंग्रेज़ 'गुमाश्ते दश्तक' (बिना चुंगी के व्यापार का अधिकार पत्र) का दुरुपयोग कर रहे हैं, और चुंगी देने की व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे हैं। अंग्रेज़ों ने दस्तक का धन लेकर भारतीय व्यापारियों को भेजना प्रारम्भ कर दिया था, जिसका परिणाम यह हुआ, कि जो धन चुंगी के रूप में नवाब को मिलता था, वह भी समाप्त होने लगा। अन्ततः मीर कासिम ने व्यापार पर से सभी आन्तरिक कर हटा लिए, जिससे भारतीय व्यापारियों की स्थिति अंग्रेज़ व्यापारियों की तरह ही हो गई। मीर कासिम के इस निर्णय से अंग्रेज़ अधिकारी स्तब्ध रह गये। सम्भवतः उसका यही निर्णय कालान्तर में बक्सर के युद्ध का कारण बना। बक्सर के युद्ध से पहले मीर कासिम अंग्रेज़ों से निम्नलिखित युद्धों में पराजित हुआ-
गिरिया का युद्ध - 4 सितम्बर अथवा 5 सितम्बर, 1762 ई.
करवा का युद्ध - 9 जुलाई, 1763 ई.
उद्यौनला का युद्ध - 1763 ई.
क्लाइव को भारत में कंपनी का गर्वनर नियुक्त किया गया
प्लासी की लड़ाई 1757 में कंपनी ने रॉबर्ट क्लाइव के तहत जीत और 1764 बक्सर की लड़ाई (बिहार में) में एक और जीत, कंपनी की शक्ति मजबूत हुई, और सम्राट शाह आलम यह दीवान की नियुक्ति द्वितीय, और बंगाल का राजस्व कलेक्टर,बिहार और उड़ीसा. कंपनी इस तरह 1773 से नीचा गंगा के मैदान के बड़े क्षेत्र के वास्तविक शासक बन गए. यह भी डिग्री से रवाना करने के लिए बम्बई और मद्रास के आसपास अपने उपनिवेश का विस्तार.एंग्लो - मैसूर युद्धों(1766-1799) और एंग्लो - मराठा युद्ध (1772-1818) के सतलुज नदी के दक्षिण भारत के बड़े क्षेत्रों के नियंत्रण स्थापित कर लिया.
पहला मैसूर युद्ध
अप्रैल, 1967 में निज़ाम, मराठामराठे और अंग्रेज़अंग्रेज़ों की सेना ने मिलकर हैदर अली पर आक्रमण किया, परन्तु कुछ समय बाद ही निज़ाम हैदर अली की ओर आ गया। अब यह युद्ध अंग्रेज़ों और हैदर अली के मध्य लड़ा गया। अंग्रेज़ों की प्रारम्भिक सफलता के कारण निज़ाम पुनः अंग्रेज़ों की ओर चला गया। हैदर अली ने उत्साहपूर्वक लड़ते हुए मार्च, 1768 में मंगलौर और बम्बई पर पुनः अधिकार कर लिया। मार्च, 1769 ई. में उसकी सेनायें मद्रास तक जा पहुँची। अंग्रेज़ों ने विवशता में हैदर अली की शर्तों पर 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि की।
बंगाल का महान अकाल
1 ब्रिटिश नीतियों का सबसे घातक परिणाम भारत मे पड़ने वाले बार बार के अकाल थे! सन 1770 के बंगाल अकाल से उस प्रान्त की 1/3 आबादी मरी थी इस के चलते ही सन्यासी विद्रोह शुरू हुआ था देखे आनंदमठ
अन्तिम अकाल 1943-1944 मे फ़िर बंगाल मे पड़ा था जिसमे कम से कम 40 लाख लोग मरे थे ठीक उस समय जब हिटलर ने यहूदियो का नरसंहार करवाया था तो उस पर तो सारी दुनिया की नजर जाती है उसकी याद मे संग्राहलय बनते है किंतु बंगाल के लोगो की दुर्दशा पर कभी विश्व मंच मे बात भी नही उठी यहा तक की ब्रिटिश सरकार ने उन दिनों जमाखोरी रोकने की कोशिश भी नही की ,उसने जो भोजनालय खुलवाए थे वे ठीक एक वक़्त पे खुलते और बंद होते थे ताकि कोई भूखा व्यक्ति उन मे दो बार ना खा ले !!!!!
इन बड़े अकालों मे हर बार 10-40 लाख लोग मरते थे इनके ठीक बाद महामारी आती थी जो बची कुची आबादी को भी मार देती थी 19 वी शताब्दी के प्रमुख अकाल थे 1868 उत्तर पशिम प्रांत का अकाल, 1866-70 के बीच मद्रास प्रान्त, राजपूताना, उत्तर पशिम प्रान्त, पंजाब, सेन्ट्रल प्रांत का अकाल ,1865 बंगाल, बिहार ,ओडिसा, का अकाल ,1875-76 मे लिटन के काल मे पूरे भारत मे पड़ा अकाल ,1899-1900 के बीच सबसे भयानक अकाल ,1899-1908 के बीच 5 बड़े अकाल इन अकालों की पून्रावर्ती ,जनक्षति,अर्थव्यवस्था के पतन को ब्रिटिश राज का सबसे अमानवीय परिणाम मान सकते है
महाराजा रणजीत सिंह
रणजीतसिंह का जन्म सन् 1780 ई. में हुआ था। महानसिंह के मरने पर रणजीतसिंह बारह वर्ष की अवस्था में मिस्ल सुकरे चकिया के नेता हुए। सन् 1798ई. में जमान शाह के पंजाब से लौट जाने पर उन्होने लाहौर पर अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे सतलज से सिंधु तक, जितनी मिस्लें राज कर रही थीं, सबको उसने अपने वश में कर लिया। सतलज और यमुना के बीच फुलकियों मिस्ल के शासक राज्य कर रहे थे। सन् 1806ई. में रणजीतसिंह ने इनको भी अपने वश में करना चाहा, परंतु सफल न हुए।
रणजीतसिंह में सैनिक नेतृत्व के गुण थे। वे दूरदर्शी थे। वे साँवले रंग का नाटे कद के मनुष्य थे। उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी। परंतु यह होते हुए भी वह तेजस्वी थे। इसलिए जब तक वह जीवित थे, सभी मिस्लें दबी थीं।
उस समय अंग्रेजों का राज्य यमुना तक पहुँच गया था और फुलकियाँ मिस्ल के राजा अंग्रेजी राज्य के प्रभुत्व को मानने लगे थे। अंग्रेजों ने रणजीतसिंह को इस कार्य से मना किया। रणजीतसिंह ने अंग्रेजों से लड़ना उचित न समझा और संधि कर ली कि सतलज के आगे हम अपना राज्य न बढ़ाएँगे। रणजीतसिंह ने फ्रांसीसी सैनिकों को बुलाकर, उसकी सैनिक कमान में अपनी सेना को विलायती ढंग पर तैयार किया।
अब उनने पंजाब के दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी भागों पर आक्रमण करना प्रारंभ किया, और दस वर्ष में मुल्तान, पेशावर और कश्मीर तक अपने राज्य को बढ़ा लिया।
रणजीतसिंह स्वयं कुरूप थे परंतु सुंदर स्त्रियाँ और सुंदर पुरुष उन्हे समान रूप से आकृष्ट करते थे और वह ऐसे लोगों से घिरा रहना पसंद करते थे।
रणजीतसिंह ने पेशावर को अपने अधिकार में अवश्य कर लिया था, किंतु उस सूबे पर पूर्ण अधिकार करने के लिए उसे कई वर्षों तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। वह पूरे पंजाब का स्वामी बन चुका; और उसे अंग्रेजों के हस्तक्षेप का सामना नहीं करना पड़ा। परंतु जिस समय अंग्रेजों ने नैपोलियन की सेनाओं के विरुद्ध सिक्खों से सहायता माँगी थी, उन्हें प्राप्त न हुई।
रणजीतसिंह ने सन् 1808 ई. में अपनी महत्वाकांक्षिणी सास सदाकोर के नाम पेशावर का राज्य परिवर्तित कर दिया था। क्योंकि यह अंग्रेजों की एजेंट महिला थी। रणजीतसिंह ने अपनी कुचक्रप्रिय सास से झगड़ा करके उसे कैद कर लिया था और ह्वदनी के गढ़ को अपने अधिकार में कर लिया था। ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी ने बंदी विधवा सदाकौर को छुड़ाया और अधिकार को वापस दिलाया। ब्रिटिश सेना के साथ रणजीतसिंह किसी प्रकार का झगड़ा नहीं चाहते थे।
दूसरा मैसूर युद्ध
अंग्रेज़ों ने 1769 ई. की संधि की शर्तो के अनुसार आचरण न किया और 1770 ई. में हैदर-अली को, समझौते के अनुसार उस समय सहायता न दी जब मराठों ने उस पर आक्रमण किया। अंग्रेज़ों के इस विश्वासघात से हैदर-अली को अत्यधिक क्षोभ हुआ था। उसका क्रोध उस समय और भी बढ़ गया, जब अंग्रेज़ों ने हैदर-अली की राज्य सीमाओं के अंतर्गत माही की फ्रांसीसी बस्तीपर आक्रमण कर अधिकार कर लिया। उसने मराठा और निज़ाम के साथ 1780 ई. में त्रिपक्षीय संधि कर ली जिससे द्वितीय मैसूर-युद्ध प्रारंभ हुआ।
पिट्स अधिनियम
1784 के पिट्स इंडिया अधिनियम ने गवर्नर की सहायता के लिए विधायी शक्तियों वाले एक कार्यकारी परिषद का गठन किया था. परिषद शुरुआत में चार सदस्यों का था जिनमें से दो सदस्य भारतीय सिविल सेवा या अनुबंधित सिविल सेवा से थे और तीसरा सदस्य एक विशिष्ट भारतीय था. चौथा सदस्य मद्रास आर्मी का कमांडर-इन-चीफ था. 1895 में जब मद्रास आर्मी को समाप्त कर दिया गया तब परिषद के सदस्यों की संख्या घटकर तीन रह गयी थी. इस परिषद की विधायी शक्तियां वापस ले ली गयी थीं और इसका दर्जा घटकर सिर्फ एक सलाहकार निकाय का रह गया था. हालांकि 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम के अनुसार इन शक्तियों को फिर से बहाल कर दिया गया. सरकारी और गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल कर समय-समय पर परिषद का विस्तार किया गया और 1935 तक इसने मुख्य विधायी निकाय के रूप में सेवा की, जब एक और अधिक प्रतिनिधि प्रकृति वाली विधानसभा का गठन किया गया और विधायी शक्तियां विधानसभा को स्थानांतरित कर दी गयीं. 15 अगस्त, 1947 को भारत की स्वतंत्रता के अवसर पर गवर्नर के तीन सदस्यीय कार्यकारी परिषद को समाप्त कर दिया गया.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त
इस्तमरारी बंदोबस्त भूमि तथा लगान वसूली सम्बंधी स्थायी व्यवस्था। लार्ड कार्नवालिस ने इग्लैंड की पार्लियामेंट के परामर्शानुसार सन् 1786 ई. में लगान वसूली का एक दससाला बंदोबस्त किया (इससे पूर्व पंचसाला तथा एकसाला बंदोबस्त असफल सिद्ध हो चुके थे) और यह निश्चय हुआ कि अंग्रेजों के अधिकृत तत्कालीन भारतीय भूमिक्षेत्र में यदि यह व्यवस्था संतोषप्रद सिद्ध हुई तो इसे स्थायी रूप दे दिया जाएगा। फलत: 1793 ई. में लार्ड कार्नवालिस ने बंगाल की मालगुजारी का स्थायी बंदोबस्त कर दिया। इसके अनुसार जमींदार जिस भूमि का लगान वसूल करते थे उसके मालिक मान लिए गए तथा लगान की दरें भी निश्चित कर दी गई। अपनी देख रेख तथा प्रबंध में जमींदार अपने अधीन भूमि से जो अतिरिक्त आय करता था उस पर भी उसी का स्वत्व मान लिया गया। कृषकों से लिया जानेवाला लगान भी पट्टे द्वारा निश्चित कर दिया गया।
इस बंदोबस्त से सरकार, जमींदार और किसान तीनों ही भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभावित हुए। भविष्य में जमीन की कीमत और पैदावार बढ़ जाने पर भी सरकार लगान नहीं बढ़ा सकती थी। अत: उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। सरकार को लेकिन लाभ यह हुआ कि समय समय पर मालगुजारी नियत करने और वसूल करने की झंझट से उसे छुटकारा मिला। जमींदारों को इससे अत्यधिक लाभ हुआ। वे समृद्ध हो गए। उनकी अंग्रेजों के प्रति राजभक्ति बढ़ी और इससे भारत में अंग्रेजी शासन की जड़ें मजबूत हुई। बंगाल में बहुत सी जमीन खेती के लायक बना दी गई और भारत में बंगाल का प्रांत सबसे अधिक समृद्धिशाली और उन्नतिशील बन गया। अधिक लगान मिलने से जमींदार धनी हुए और वाणिज्य व्यापार में भी इससे सुविधा हुई। परंतु किसानों को इस व्यवस्था से कुछ भी लाभ न हुआ। उन्हें लगान भी अधिक देना पड़ता था ओर जमींदारों के कारिंदों के हाथों उन्हें अत्याचार भी सहने पड़ते थे। गरीब होने के कारण किसान अत्याचारों के विरुद्ध अदालती कार्रवाई भी नहीं कर सकते थे। जमींदारों के अत्याचारों को रोकने के लिए 1859 ई. में बंगाल टेनेन्सी ऐक्ट बनाना पड़ा।
चौथा मैसूर युद्ध
चौथा युद्ध गर्वनर-जनरल लॉर्ड मॉर्निंग्टन (बाद में वेलेज़ली) ने इस बहाने से शुरू किया कि टीपू को फ़्रांसीसियों से सहायता मिल रही है। अल्पकालिक, परन्तु भयानक सिद्ध हुआ। इसका कारण टीपू सुल्तान द्वारा अंग्रेज़ों के आश्रित बन जाने के संधि प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना था, तत्कालीन गवर्नर- जनरल लॉर्ड वेलेज़ली को टीपू की ब्रिटिश- विरोधी गतिविधियों का पूर्ण विश्वास हो गया था। उसे पता चला कि 1792 ई. की पराजय के उपरांत टीपू ने फ़्रांस, कुस्तुनतुनिया और अफ़ग़ानिस्तान के शासकों के साथ इस अभ्रिप्राय से संधि का प्रयास किया था कि भारत से अंग्रेज़ों को निकाल दिया जाय।
टीपू सुल्तान की मृत्यु
'फूट डालो, शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेज़ों ने संधि करने के बाद टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार 4 मई सन् 1799 ई. को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। 1799 ई. में उसकी पराजय तथा मृत्यु पर अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य के एक हिस्से में उसके पुराने हिन्दू राजा के जिस नाबालिग पौत्र को गद्दी पर बैठाया, उसका दीवान पुरनिया को नियुक्त कर दिया।
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