ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 12/12/1600 थी । इसे यदाकदा जॉन कंपनी के नाम से भी जाना जाता था । इसे ब्रिटेन की महारानी ने भारत के साथ व्यापार करने के लिये 21 सालो तक की छूट दे दी । बाद में कम्पनी ने भारत के लगभग सभी क्षेत्रों पर अपना सैनिक तथा प्रशासनिक अधिपत्य जमा लिया । 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी सिपाही विद्रोह के बाद सन 1858 में इसका विलय हो गया ।
अकबर की मृत्यु
सम्राट अकबर अपनी योग्यता, वीरता, बुद्धिमत्ता और शासन−कुशलता के कारण ही एक बड़े साम्राज्य का निर्माण कर सका था। उसका यश, वैभव और प्रताप अनुपम था। इसलिए उसकी गणना भारतवर्ष के महान सम्राटों में की जाती है। उसका अंतिम काल बड़े क्लेश और दु:ख में बीता था। अकबर ने 50 वर्ष तक शासन किया था। उस दीर्घ काल में मानसिंह और रहीम के अतिरिक्त उसके सभी विश्वसनीय सरदार−सामंतों का देहांत हो गया था। अबुल फ़ज़ल, बीरबल, टोडरमल, पृथ्वीराज जैसे प्रिय दरबारी परलोक जा चुके थे। उसके दोनों छोटे पुत्र मुराद और शहज़ादा दानियाल का देहांत हो चुका था। पुत्र सलीम शेष था; किंतु वह अपने पिता के विरुद्ध सदैव षड्यंत्र और विद्रोह करता रहा था। जब तक अकबर जीवित रहा, तब तक सलीम अपने दुष्कृत्यों से उसे दु:खी करता रहा; किंतु वह सदैव अपराधों को क्षमा करते रहे थे। जब अकबर सलीम के विद्रोह से तंग आ गया, तब अपने उत्तरकाल में उसने उस बड़े बेटे शाहज़ादा ख़ुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया था। किंतु अकबर ने ख़ुसरो को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया, लेकिन उस महत्त्वाकांक्षी युवक के मन में राज्य की जो लालसा जागी, वह उसकी अकाल मृत्यु का कारण बनी। जब अकबर अपनी मृत्यु−शैया पर था, उस समय उसने सलीम के सभी अपराधों को क्षमा कर दिया और अपना ताज एवं खंजर देकर उसे ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उस समय अकबर की आयु 63 वर्ष और सलीम की 38 वर्ष थी। अकबर का देहावसान अक्टूबर, सन् 1605 में हुआ था। उसे आगरा के पास सिकंदरा में दफ़नाया गया, जहाँ उसका कलापूर्ण मक़बरा बना हुआ है। अकबर के बाद सलीम जहाँगीर के नाम से मुग़ल सम्राट बना।
जहाँगीर का राज्याभिषेक
जहाँगीर का राज्याभिषेक 24 अक्टूबर 1605
(शासन काल सन् 1605 से सन् 1627)
नूरुद्दीन सलीम जहाँगीर का जन्म फ़तेहपुर सीकरी में स्थित ‘शेख़ सलीम चिश्ती’ की कुटिया में राजा भारमल की बेटी ‘मरियम ज़मानी’ के गर्भ से 30 अगस्त, 1569 ई. को हुआ था। अकबर सलीम को ‘शेख़ू बाबा’ कहा करता था। सलीम का मुख्य शिक्षक अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना था। अपने आरंभिक जीवन में जहाँगीर शराबी और आवारा शाहज़ादे के रूप में बदनाम था। उसके पिता सम्राट अकबर ने उसकी बुरी आदतें छुड़ाने की बड़ी चेष्टा की, किंतु उसे सफलता नहीं मिली। इसीलिए समस्त सुखों के होते हुए भी वह अपने बिगड़े हुए बेटे के कारण जीवन-पर्यंत दुखी: रहा। अंतत: अकबर की मृत्यु के पश्चात जहाँगीर ही मुग़ल सम्राट बना था। उस समय उसकी आयु 36 वर्ष की थी। ऐसे बदनाम व्यक्ति के गद्दीनशीं होने से जनता में असंतोष एवं घबराहट थी। लोगों को आंशका होने लगी कि, अब सुख−शांति के दिन विदा हो गये और अशांति−अव्यवस्था एवं लूट−खसोट का ज़माना फिर आ गया।
गुरु अर्जुन देव का वध
गुरु अर्जन देव ( जन्म: 15 अप्रैल सन् 1563 - मृत्यु: 30 मई 1606) सिक्खों के पाँचवें गुरु थे। ये 1581 ई. में गद्दी पर बैठे। गुरु अर्जन देव का कई दृष्टियों से सिक्ख गुरुओं में विशिष्ट स्थान है। 'गुरु ग्रंथ साहब' आज जिस रूप में उपलब्ध है, उसका संपादन इन्होंने ही किया था। गुरु अर्जन देव सिक्खों के परम पूज्य चौथे गुरु रामदास के पुत्र थे। गुरु नानक से लेकर गुरु रामदास तक के चार गुरुओं की वाणी के साथ-साथ उस समय के अन्य संत महात्माओं की वाणी को भी इन्होंने 'गुरु ग्रंथ साहब' में स्थान दिया।
गुरु जी रावी में प्रवेश करके अपना शरीर त्याग कर सचखंड जी बिराजे। उस दिन ज्येष्ठ सुदी चौथ संवत 1553 विक्रमी थी। गुरु जी का ज्योति ज्योत समाने का सारे शहर में बड़ा शोक बनाया गया। गुरु जी के शरीर त्यागने के स्थान पर गुरुद्वारा ढ़ेरा साहिब लाहौर शाही किले के पास विद्यमान है।
नूरजहाँ से जहांगीर का विवाह
जहाँगीर का जन्म 30 अगस्त वर्ष 1569 में फतेहपुर सीकरी में हुआ था। जहांगीर अकबर का बेटा था। इसलिए अकबर ने अपनी औलाद का नाम मुहम्मद सलीम रखा। जवान राजकुमार सलीम को पढ़ाई के लिए वर्ष 1573 में फतेहपुर सीकरी भेजा गया। उसे परशियन, टर्किश, अरेबियन, हिंदी, इतिहास, भूगोल तथा गणित पढ़ाया गया। इसी कारण वह एक अच्छा शिक्षित युवक बन गया। अकबर के देहांत के बाद जहाँगीर ने राज सम्भाला। यह सब 3 नवम्बर वर्ष 1605 में आगरा के किले में हुआ। उसने राजकुमुट स्वयं अपने सर पर रखा और 'नूर मुहम्मद जहाँगीर बादशाह -ए-गाजी के नाम से जाना गया।
जैसे उसके पिता को आगरा से लगाव था उसी प्रकार जहाँगीर को भी आगरा से प्यार था लेकिन अकबर और जहाँगीर में काफी फर्क था। अकबर को शानदार इमारतें बनाने का शौक था तो जहाँगीर को चित्रकारी का। लेकिन फिर भी जहांगीर ने अधूरी इमारत सिकन्दरा पूरी की और कुछ और इमारतें बनवाई। यह कहावत है की बचपन में उसे एक खुबसूरत लड़की मेरुनिसा से प्यार हो गया था और वो उससे शादी करना चाहता था। लेकिन उसके पिता अकबर इस शादी के खिलाफ थे और इसी कारण उन्होंने उसकी शादी शेर अफगान से कर दी और उसे बिहार का गवर्नर बना दिया। जहाँगीर ने शेर अफगान को मार डाला और बाद में उसने 'नूरमहल ' से वर्ष 1911 में शादी कर ली। जिसे जहाँगीर नूरजहाँ कहा करते थे, जिसका अर्थ है सारी दुनिया की रोशनी!
जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने 'नूरजहाँ ' पर सारी जिम्मेदारियां थोप दी और वह सिर्फ नाम के राजा बन कर रह गये। नूरजहाँ को चित्रकारी तथा कविता लिखने का शौक था। नूरजहाँ अपने माता पिता के ज्यादा करीब थी। उसके पिता के देहांत के उपरान्त उसने एक सुंदर इमारत यमुना नदी के पूर्वी तट पर बनवाई, और उसका नाम इतमत-उद-दौला रखा। यह एक सुंदर कब्र है जोकि सफेद संगमरमर से बनी है
सर थॉमस रो ने जहाँगीर से मुलाकात की
थॉमस रो अथवा 'टॉमस रो' बादशाह जहाँगीर के शासनकाल में 1616 ई. में भारत आया था।
1. इंग्लैण्ड के राजा से आज्ञा लेकर उसने कुछ लोगों को एकत्र कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की थी।
2. थॉमस रो ने अजमेर के क़िले में जहाँगीर से मुलाकात की थी।
3. उसने बादशाह के सामने खड़े होकर एक याचक के रूप में भारत में व्यापार करने की अनुमति माँगी थी।
4. भारत की ग़ुलामी की शुरुआत उसी दिन से हो गई थी, जिस दिन थॉमस रो भारत में आया।
5. थॉमस रो ने सम्राट जहाँगीर की अभिरूचियों तथा धार्मिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से लिखा है।
6. उसने खुसरो प्रकरण का भी उल्लेख किया है।
शिवाजी का जन्म
छत्रपति शिवाजी राजे भोसले (1630-1680) ने 1674में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था !
जहांगीर की मृत्यु
अकबर प्रधानमंत्री तीन लड़केथे। सलीम, अर्थ और दानियाल (मुग़ल परिवार)। मुराद और दानियाल पिता के जीवन में शराब पीने की वजह से मर चुके थे। सलीम अकबर की मृत्यु पर नोरालदीन जहांगीर के उपनाम से तख्त नशीन हुआ। 1605 ई. में कई उपयोगी सुधार लागू किए। कान और नाक और हाथ आदि काटने की सजा रद्द कीं। शराब और अन्य नशा हमलावर वस्तुओं का हकमा बंद। कई अवैध महदलात हटा दिए। प्रमुख दिनों में जानवरों का ज़बीहह बंद. फ़्रीआदीं की दाद रस्सी के लिए अपने महल की दीवार से जंजीर लटका दी। जिसे जंजीर संतुलन कहा जाता था। 1606 ई. में उसके सबसे बड़े बेटे ख़ुसरो ने विद्रोह कर दिया. और आगरे से निकलकर पंजाब तक जा पहुंचा। जहांगीर ने उसे हराया. सखोंकेगोरो अर्जुन देव जो ख़ुसरो की मदद कर रहे थे। शाही इताब में आ गए। 1614 ई. में राजकुमार खुर्रम शाहजहान ने मेवाड़ के राणा अमर सिंह को हराया। 1620 ई. में कानगड़ह स्वयं जहांगीर ने जीत लिया। 1622 ई. में कंधार क्षेत्र हाथ से निकल गया। जहांगीर ही समय में अंग्रेज सर टामस रो राजदूत द्वारा, पहली बार भारतीय व्यापारिक अधिकार करने के इरादे से आए। 1623 ई. में खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। क्योंकि नूरजहाँ अपने दामाद नगरयार को वली अहद बनाने की कोशिश कर रही थी। अंत 1625 ई. में बाप और बेटे में सुलह हो गई। सम्राट जहांगीर अपनी तज़क जहांगीर मैन लिखते हैं कि इत्र गुलाब मेरे युग सरकार में नूर जहां बेगम की मां ने आविष्कार किया था। जहांगीर चित्रकारी और कला का बहुत शौकीन था। उसने अपने हालात एक किताब तोज़क जहांगीर में लिखे हैं। उसे शिकार से भी प्रेरित थी. शराब पीने के कारण अंतिम दिनों में बीमार रहता था। 1627 ई. में कश्मीर से वापस आते समय रास्ते में ही भम्बर के स्थान पर निधन किया. लाहौर के पास शाऔतरह में दफन हुआ।
शाह जहाँ
शाह जहाँ पांचवे मुग़ल शहेंशा था। शाह जहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। किन्तु इतिहास में उनका नाम केवल इस कारण नहीं लिया जाता। शाहजहाँ का नाम एक ऐसे आशिक के तौर पर लिया जाता है जिसने अपनी बेग़म मुमताज़ महल के लिये विश्व की सबसे ख़ूबसूरत इमारत ताज महल बनाने का यत्न किया।
सम्राट जहाँगीर के मौत के बाद, छोटी उम्र में ही उन्हें मुगल सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में चुन लिया गया था। 1627 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद वह गद्दी पर बैठे। उनके शासनकाल को मुग़ल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल बुलाया गया है।
मुमताज़ महल
मुमताज़ महल अर्जुमंद बानो बेगम का ज्यादा प्रचलित नाम है। इनका जन्म अप्रैल 1593 में आगरा में हुआ था। इनके पिता अब्दुल हसन असफ़ ख़ान एक फारसी सज्जन थे जो नूरजहाँ के भाई थे। नूरजहाँ बाद में सम्राट जहाँगीर की बेगम बनीं। 19 वर्ष की उम्र में अर्जुमंद का निकाह शाहजहाँ से 10 मई, 1612 को हुआ। अर्जुमंद शाहजहाँ की तीसरी पत्नी थी पर शीघ्र ही वह उनकी सबसे पसंदीदा पत्नी बन गईं। उनका निधन बुरहानपुर में 17 जून, 1631 को 14वीं संतान, बेटी गौहारा बेगम को जन्म देते वक्त हुआ। उनको आगरा में ताज महल में दफनाया गया।
भारत के बंगाल में अंग्रेजों को व्यापार करने की अनुमति दे दी गई
प्लासी के युद्ध में जीत से कम्पनी को लाभ स्वरूप प्राप्त हुआ- भारत के सबसे समॄद्ध तथा घने बसे भाग से व्यापार करने का एकाधिकार, बंगाल के शासक पर भारी प्रभाव और बंगाल पर कम्पनी ने अप्रत्यक्ष सम्प्रभुता, बंगाल के नवाब से नजराना, भेंट, क्षतिपूर्ति के रूप मे भारी धन वसूली, एक सुनिश्चित क्षेत्र २४ परगना की जागीर का राजस्व मिलने लगा। बंगाल पर अधिकार व एकाधिकारी व्यापार से इतना धन मिला कि इंग्लैंड से धन मँगाने कि जरूरत नही रही ,इस धन को भारत के अलावा चीन से हुए व्यापार मे भी लगाया गया । इस धन से सैनिक शक्ति गठित की गई जिसका प्रयोग फ्रांस तथा भारतीय राज्यों के विरूद्ध किया गया । देश से धन निष्काष्न शुरू हुआ जिसका लाभ इंग्लैंड को मिला वहां इस धन के निवेश से ही औद्योगिक क्रांति शुरू हुई ।
औरंगज़ेब
अबुल मुज़फ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर (४ नवम्बर १६१८ – ३ मार्च १७०७) जिसे आमतौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर (स्वंय को दिया हुआ शाही नाम जिसका अर्थ होता है विश्व विजेता) के नाम से जाना जाता था भारत पर राज्य करने वाला छठा मुग़ल शासक था। उसका शासन १६५८ से लेकर १७०७ में उसकी मृत्यु होने तक चला। औरंगज़ेब ने भारतीय उपमहाद्वीप पर आधी सदी से भी ज्यादा समय तक राज्य किया। वो अकबर के बाद सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाला मुग़ल शासक था। अपने जीवनकाल में उसने दक्षिणी भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार करने का भरसक प्रयास किया पर उसकी मृत्यु के पश्चात मुग़ल साम्राज्य सिकुड़ने लगा।
औरंगज़ेब के शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। वो अपने समय का शायद सबसे धनी और शातिशाली व्यक्ति था जिसने अपने जीवनकाल में दक्षिण भारत में प्राप्त विजयों के जरिये मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील मील में फैलाया और १५ करोड़ लोगों पर शासन किया जो की दुनिया की आबादी का १/४ था।
औरंगज़ेब ने पूरे साम्राज्य पर फतवा-ए-आलमगीरी (शरियत या इस्लामी कानून पर आधारित) लागू किया और कुछ समय के लिए गैर-मुस्लिमो पर अतिरिक्त कर भी लगाया। गैर-मुसलमान जनता पर शरियत लागू करने वाला वो पहला मुसलमान शासक था। उसने अनेक हिन्दू धार्मिक स्थलों को नष्ट किया और गुरु तेग बहादुर की हत्या करवा दी ।
शाहजहाँ को कैद कर लिया गया
सन् 1652 में शाहजहा बीमार पड़ा और ऐसा लगने लगा कि शाहजहाँ की मौत आ जाएगी । दारा शिकोह, शाह सुजा और औरंगज़ेब में सत्ता संघर्ष चलने लगा । शाह सुज़ा, जिसने अपने को बंगाल का गवर्नर घोषित करवाया था को हारकर बर्मा के अराकान क्षेत्र जाना पड़ा और 1659 में औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को कैद करने के बाद अपना राज्याभिषेख करवाया । दारा शिकोह को फाँसी दे दी गई । ऐसा कहा जाता है कि शाहजहाँ को मारने के लिए औरंगज़ेब ने दो बार ज़हर भिजवाया । पर जिन हकीमों से उसने ज़हर भिजवाया था वो शाहजहाँ के वफ़ादार थे और शाहजहाँ के विष देने के बज़ाय वे खुद ज़हर पी गए ।
औरंगजेब द्वारा शिवाजी को कैद कर लिया गया
शिवाजी को औरंगज़ेब ने गिरफ़्तार कर तो लिया पर शिवाजी और सम्भाजी के भाग निकलने पर उसके लिए शदीद फ़िक्र का सबब बन गया ।
शिवाजी की मृत्यु
तीन सप्ताह की बीमारी के बाद शिवाजी की मृत्यु अप्रैल 1680 में हुई । उस समय शिवाजी के उत्तराधिकार शम्भाजी को मिले। शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र शम्भाजी थे और दूसी पत्नी से राजाराम नाम एक दूसरा पुत्र था । उस समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया ।उस समय औरंगजेब राजा शिवाजि का देहान्त देखकर अपनी पुरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाशा से अपनी ५,००,००० सेना सागर लेकर दक्षिण भारत जीतने निकला । औरंगजेबने दक्षिण मे आतेही अदिल्शाहि २ दिनो मे ओर कुतुबशहि १ हि दिनो मे खतम कर दी । पर राजा सम्भाजी के नेतृत्व मे मराठाओने ९ साल युद्ध करते हुये अपनी स्वतन्त्रता बरकरार रखी । औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया । शम्भाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी । औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरिकेसे शम्भाजी के खिलाफ आक्रमण करना शुरु किया । उसने अंततः 1689 में संभाजी के बिवी के सगे भाई ने याने गणोजी शिर्के की मुखबरी से शम्बाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया । औरंगजेब ने राजा सम्भाजी को बदसुलुकि ओउर बुरी हाल कर के मार दिया । अपनी राजा को औरंगजेब ने बदसुलुकि ओउर बुरी हाल मारा हुआ देखकर सबी मराठा स्वराज्य क्रोधीत हुआ । उन्होने अपनी पुरी ताकद से तीसरा राजा राम के नेत्रुत्व मे मुगलों से संघर्ष जारी रखा ।1700 इस्वी में राजाराम की मृत्यु हो गई । उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही । आखिरकार २५ साल मराठा स्वराज्य के यूदध लडके थके हुये औरंगजेब की उसी छ्त्रपती शिवाजी के स्वराज्य मे दफन हुये ।
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